पुरातत्त्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के दसवें दिवस पर तीन सत्रों में आयोजित व्याख्यानों में कला, पुरातत्व और प्राचीन वस्तु संरक्षण के विविध पहलुओं पर जानकारी दी गई। पहले सत्र में श्री इंद्र प्रकाश, अधीक्षण पुरातत्वविद (से.नि.), भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार ने एंटीक्यूरियन लॉ विषय पर अपने व्याख्यान में बताया कि यह कानून 100 वर्ष से अधिक पुराने पुरावशेषों, मूर्तियों, शिलालेखों, पांडुलिपियों और सिक्कों के संरक्षण के लिए बनाया गया है। उन्होंने कहा कि इनकी बिक्री, तस्करी या विदेश निर्यात पर सख्त प्रतिबंध है और सभी पुरावशेषों का पंजीकरण अनिवार्य है। साथ ही, उन्होंने 1958, 1972 और 1978 के अधिनियमों का महत्व और उनके लागू करने की प्रक्रियाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
दूसरे सत्र में डॉ0 सुरेश कुमार दुबे, पुरातत्व अधिकारी (से.नि.), उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग ने उत्तराखंड में पुरातात्विक खोज और सर्वेक्षण की पद्धति पर पीपीटी प्रस्तुति के माध्यम से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र प्राचीन काल से ही कला और पुरातत्व के क्षेत्र में अत्यंत समृद्ध रहा है। लगभग एक सहस्राब्दी पूर्व यहां भव्य मंदिर और अद्वितीय मूर्तिकला का निर्माण हुआ। इस क्षेत्र से प्राप्त प्रतिमाएं भारतीय कला की अनुपम धरोहर मानी जाती हैं। डॉ0 दुबे ने यह भी बताया कि मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला में प्रतिहार शैली की छाप स्पष्ट दिखाई देती है, किंतु इतने निपुण शिल्पियों को प्रशिक्षण कहां से प्राप्त हुआ, यह आज भी रहस्य बना हुआ है।
कार्यक्रम के अवसर पर श्रीमती रेनू द्विवेदी, निदेशक, उ०प्र० राज्य पुरातत्व विभाग ने दोनों अतिथि वक्ताओं का स्वागत करते हुए उन्हें स्मृति-चिन्ह प्रदान किया और उनका सम्मान किया। कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन डॉ0 मनोज कुमार यादव द्वारा किया गया।
इस अवसर पर लगभग 200 प्रतिभागियों की उपस्थिति रही। पुरातत्व निदेशालय के उत्खनन एवं अन्वेषण अधिकारी श्री राम विनय, सहायक पुरातत्व अधिकारी श्री ज्ञानेंद्र कुमार रस्तोगी, श्री बलिहारी सेठ, श्री अभयराज सिंह, संतोष कुमार सिंह, आशीष कुमार, अकील खान, मयंक, अभिषेक कुमार द्वितीय, हिमांशु, निर्भय सहित अन्य विभागीय अधिकारी एवं कर्मचारी भी उपस्थित रहे।
